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mahabharat 12.354.9: अतिथि ने कहा, "हे ब्राह्मण! मेरी भी यही इच्छा है। आपकी तरह मैं भी उत्तम धर्म का आश्रय लेना चाहता हूँ, परन्तु मैं भी इस विषय में असमंजस में हूँ। स्वर्ग के अनेक द्वार (साधन) हैं, अतः मैं किसका आश्रय लूँ? मैं भी इसका निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ॥ 9॥   |   mahabharat अध्याय 12.354: अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 354: अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.354.9 
अतिथिरुवाच
अहमप्यत्र मुह्यामि ममाप्येष मनोरथ:।
न च संनिश्चयं यामि बहुद्वारे त्रिविष्टपे॥ ९॥
 
 
अनुवाद
अतिथि ने कहा, "हे ब्राह्मण! मेरी भी यही इच्छा है। आपकी तरह मैं भी उत्तम धर्म का आश्रय लेना चाहता हूँ, परन्तु मैं भी इस विषय में असमंजस में हूँ। स्वर्ग के अनेक द्वार (साधन) हैं, अतः मैं किसका आश्रय लूँ? मैं भी इसका निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ॥ 9॥
 
The guest said, "O Brahmin! I too have the same desire. Like you, I too want to take shelter of the best religion, but I too am confused about this matter. There are many doors (means) to heaven, so which one should I take shelter of? I too am unable to decide this.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)