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mahabharat 12.354.3: कभी-कभी मेरी इच्छा होती है कि मैं एकान्त में रहूँ, आत्मा की शरण लूँ और उसी में स्थित हो जाऊँ। परन्तु इन तुच्छ विषयों से बंध जाने के कारण वह इच्छा नष्ट हो जाती है ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.354: अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 354: अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.354.3 
अहमात्मानमास्थाय एक एवात्मनि स्थितिम्।
कर्तुं काङ्क्षामि नेच्छामि बद्ध: साधारणैर्गुणै:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी मेरी इच्छा होती है कि मैं एकान्त में रहूँ, आत्मा की शरण लूँ और उसी में स्थित हो जाऊँ। परन्तु इन तुच्छ विषयों से बंध जाने के कारण वह इच्छा नष्ट हो जाती है ॥3॥
 
Sometimes I wish to remain alone and take refuge in the Self and be established in it. But being bound to these trivial objects, that wish is destroyed. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)