अध्याय 354: अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन
श्लोक 1: ब्राह्मण बोला - "भोले! तुम्हारे मधुर वचन सुनकर ही मुझमें तुम्हारे प्रति स्नेह उत्पन्न हो गया है। तुम्हारे प्रति मेरा मैत्री भाव हो गया है; इसलिए मैं तुमसे कुछ कह रहा हूँ, कृपया मेरी बात सुनो॥1॥
श्लोक 2: ब्रह्मन्! मैं अपने पुत्रों को गृहस्थ धर्म के अधीन रखकर उत्तम धर्म का पालन करना चाहता हूँ। ब्रह्मन्! मुझे बताइए, मेरे लिए कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ होगा?॥2॥
श्लोक 3: कभी-कभी मेरी इच्छा होती है कि मैं एकान्त में रहूँ, आत्मा की शरण लूँ और उसी में स्थित हो जाऊँ। परन्तु इन तुच्छ विषयों से बंध जाने के कारण वह इच्छा नष्ट हो जाती है ॥3॥
श्लोक 4: अब तक मेरा सारा जीवन पुत्र से फल पाने की इच्छा में व्यतीत हुआ है। अब मैं ऐसा धर्ममय धन इकट्ठा करना चाहता हूँ जो परलोक की यात्रा के लिए उपयोगी हो।॥4॥
श्लोक 5: इस संसार सागर से पार जाने की मेरी इच्छा है; इसलिए मैं सोच रहा हूँ कि धर्मरूपी नाव कहाँ मिलेगी ॥5॥
श्लोक 6-7: जब मैं सुनता हूँ कि सांसारिक भोगों के संपर्क में आए हुए सात्विक पुरुष भी नाना प्रकार की यातनाएँ भोगते हैं और जब देखता हूँ कि सब लोगों पर यमराज की ध्वजाएँ लहरा रही हैं, तब भोग के समय भोगों को प्राप्त होने पर भी मुझे उन्हें भोगने की इच्छा नहीं होती। जब मैं संन्यासियों को भी दूसरों के द्वार पर अन्न और वस्त्र माँगते देखता हूँ, तब उस त्याग-धर्म को करने में भी मेरा मन नहीं लगता; इसलिए हे अतिथि! अब आप अपनी बुद्धि के बल से मुझे धर्म के द्वारा धर्म का पालन कराएँ॥6-7॥
श्लोक 8: धर्मयुक्त वचन बोलने वाले उस ब्राह्मण के वचन सुनकर विद्वान अतिथि ने मधुर वाणी में ये उत्तम वचन कहे।
श्लोक 9: अतिथि ने कहा, "हे ब्राह्मण! मेरी भी यही इच्छा है। आपकी तरह मैं भी उत्तम धर्म का आश्रय लेना चाहता हूँ, परन्तु मैं भी इस विषय में असमंजस में हूँ। स्वर्ग के अनेक द्वार (साधन) हैं, अतः मैं किसका आश्रय लूँ? मैं भी इसका निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ॥ 9॥
श्लोक 10: कुछ ब्राह्मण मोक्ष की प्रशंसा करते हैं, कुछ यज्ञ के फल की, कुछ संन्यास मार्ग का अनुसरण करते हैं, कुछ गृहस्थ मार्ग का।
श्लोक 11: कोई राजधर्म की खोज में है, कोई आत्मज्ञान की, कोई गुरुसेवा की और कोई मौनव्रत का आश्रय ले रहा है ॥11॥
श्लोक 12: कुछ लोग माता-पिता की सेवा करके स्वर्ग गए, कुछ अहिंसा से और कुछ सत्य से स्वर्ग के भागी हुए॥12॥
श्लोक 13: कितने ही वीर पुरुष युद्ध में शत्रुओं से लड़ते हुए मारे गए हैं और स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं। कितने ही मनुष्य अपने उत्तम स्वभाव से सिद्धि प्राप्त करके स्वर्ग को गए हैं।॥13॥
श्लोक 14: कुछ बुद्धिमान पुरुष, जो संतुष्ट हैं और जिनकी इन्द्रियाँ दृढ़ हैं, वेदों में लिखे व्रतों का पालन करके और स्वाध्याय करके स्वर्ग में शुभ स्थान प्राप्त कर चुके हैं ॥14॥
श्लोक 15: कितने ही सरल और शुद्धात्मा पुरुष एक दूसरे से सहज ही जुड़कर दुष्ट मनुष्यों द्वारा मारे गए हैं और स्वर्गलोक में मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं ॥15॥
श्लोक 16: इस संसार में धर्म के अनेक द्वार खुले हैं; उनके कारण मेरी बुद्धि भी उसी प्रकार व्याकुल और चंचल हो गई है, जैसे वायु के वेग से बादल व्याकुल हो जाते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥