| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 352: नारदके द्वारा इन्द्रको उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणकी कथा सुनानेका उपक्रम » श्लोक 2 |
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| | | | श्लोक 12.352.2  | भीष्म उवाच
सर्वत्र विहितो धर्म: स्वर्ग: सत्यफलं महत्।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया॥ २॥ | | | | | | अनुवाद | | भीष्मजी बोले - राजन! सभी आश्रमों में स्वधर्म पालन का विधान है, सभी में स्वर्ग का तथा महान सत्य - मोक्ष का भी साधन है। यज्ञ, दान, तप आदि धर्म के अनेक द्वार हैं। अतः इस संसार में कोई भी धार्मिक कार्य निष्फल नहीं है। 2॥ | | | | Bhishmaji said – King! In all the ashrams there is a rule of following Swadharma, in all there is a means to heaven and also to the great truth - salvation. There are many doors of religion like yagya, charity, penance etc. Therefore, no religious activity in this world is fruitless. 2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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