श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 351: ब्रह्मा और रुद्रके संवादमें नारायणकी महिमाका विशेषरूपसे वर्णन  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  12.351.7-8 
नागतिर्न गतिस्तस्य ज्ञेया भूतेषु केनचित्।
सांख्येन विधिना चैव योगेन च यथाक्रमम्॥ ७॥
चिन्तयामि गतिं चास्य न गतिं वेद्मि चोत्तराम्।
यथाज्ञानं तु वक्ष्यामि पुरुषं तु सनातनम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
समस्त जीवात्माएँ किस प्रकार भिन्न-भिन्न शरीरों में आती-जाती हैं? मैं क्रमशः सांख्य और योग के साधनों से उनकी गति का चिंतन करता हूँ; किन्तु उस परम गति को समझ नहीं पाता। फिर भी मैं अपने अनुभव के अनुसार उस सनातन पुरुष का वर्णन करता हूँ ॥ 7-8॥
 
Among all living beings, how do they come and go from different bodies? I contemplate their movement through the methods of Sankhya and Yoga respectively; but I am unable to understand that sublime movement. However, I describe that eternal person according to my experience. ॥ 7-8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)