श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 351: ब्रह्मा और रुद्रके संवादमें नारायणकी महिमाका विशेषरूपसे वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.351.5 
विश्वमूर्धा विश्वभुजो विश्वपादाक्षिनासिक:।
एकश्चरति क्षेत्रेषु स्वैरचारी यथासुखम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उनका सिर, भुजाएँ, पैर, नेत्र और नासिका है। वे एकमात्र भगवान् जो स्वतन्त्र रूप से विचरण करते हैं, सभी लोकों में सुखपूर्वक विचरण करते हैं।
 
The entire universe is His head, arms, legs, eyes and nose. The one and only Supreme Personality of Godhead who moves freely roams all regions happily.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)