श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 351: ब्रह्मा और रुद्रके संवादमें नारायणकी महिमाका विशेषरूपसे वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.351.15 
न लिप्यते फलैश्चापि पद्मपत्रमिवाम्भसा।
कर्मात्मा त्वपरो योऽसौ मोक्षबन्धै: स युज्यते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे अप्रभावित रहता है, वैसे ही परमात्मा भी कर्मों के फल से अप्रभावित रहता है। परन्तु जो आत्मा कर्मों का कर्ता है और बंधन-मोक्ष में सम्बन्ध स्थापित करता है, वह उससे भिन्न है॥ 15॥
 
Just as a lotus leaf remains unaffected by water even after staying in it, similarly the Supreme Soul remains unaffected by the results of actions. But the soul which is the doer of actions and establishes a relation between bondage and liberation is different from Him.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)