अध्याय 350: वैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मा और रुद्रका मिलन एवं ब्रह्माजीद्वारा परम पुरुष नारायणकी महिमाका वर्णन
श्लोक 1: जनमेजय ने पूछा, "ब्रह्मन्! पुरुष अनेक हैं या एक ही? इस संसार में कौन-सा पुरुष श्रेष्ठ है? अथवा यहाँ सबका उद्गम स्थान कौन-सा कहा गया है?"
श्लोक 2: वैशम्पायन बोले, "हे कुरुवंश का भार वहन करने वाले राजन! सांख्य और योग के मतानुसार इस संसार में बहुत से पुरुष हैं। वे 'एकपुरुषवाद' को स्वीकार नहीं करते॥ 2॥
श्लोक 3-4: एक ही मनुष्य अनेक मनुष्यों का उद्गम स्थान कैसे कहा जा सकता है? इसका वर्णन करने के लिए मैं ज्ञानी, तपस्वी, जितेन्द्रिय एवं पूज्य परमर्षि गुरु व्यासजी को प्रणाम करके तुम्हें अधिक पुण्यशाली विश्वात्मा पुरुष का वर्णन करूँगा। 3-4॥
श्लोक 5: हे राजन्! यह मनुष्य, ऋत और सत्य से संबंधित सूक्त समस्त वेदों में प्रसिद्ध है। महर्षि व्यास ने इसका बहुत ही अच्छी तरह से चिंतन किया है।॥5॥
श्लोक 6: भारतवर्ष में कपिल आदि ऋषियों ने सामान्य और विशेष रूप से अध्यात्म का चिन्तन करके अनेक शास्त्रों का प्रतिपादन किया है।
श्लोक 7: परन्तु जिस प्रकार व्यास जी ने संक्षेप में मानव की एकता को समझाया है, उसी प्रकार मैं भी उन अनंत तेजस्वी गुरु की कृपा से तुम्हें समझाऊंगा।
श्लोक 8: प्रजानाथ! इस विषय के जानकार लोग रुद्र और ब्रह्माजी के वार्तालाप के रूप में इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं॥8॥
श्लोक 9: नरेश्वर! क्षीरसागर के मध्य भाग में वैजयन्त नाम से प्रसिद्ध एक महान पर्वत है, जो सुवर्ण के समान चमकता है॥9॥
श्लोक 10: वहाँ एकान्तवासी ब्रह्मा प्रतिदिन ब्रह्मलोक से आकर आध्यात्मिक उन्नति का चिंतन करते थे और उस वैजयन्त पर्वत का सेवन करते थे॥10॥
श्लोक 11-12: एक दिन जब बुद्धिमान चतुर्मुख वाले ब्रह्माजी वहाँ बैठे थे, उसी समय उनके ललाट से उत्पन्न पुत्र, महायोगी, त्रिनेत्रधारी भगवान शिव आकाशमार्ग से विचरण करते हुए सहसा वैजयन्त पर्वत के सामने आ गए और शीघ्र ही आकाश से उस पर्वत के शिखर पर उतर आए॥11-12॥
श्लोक 13-14: ब्रह्माजी को अपने सम्मुख देखकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनके दोनों चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया। भगवान शिव को अपने चरणों में लेटे हुए देखकर उस समय एकमात्र सर्वशक्तिमान भगवान प्रजापति ने उन्हें अपने दाहिने हाथ से उठा लिया और बहुत देर के बाद अपने निकट आये हुए पुत्र से इस प्रकार कहा॥13-14॥
श्लोक 15-16: ब्रह्माजी ने कहा- महाबाहो! तुम्हारा स्वागत है। तुम सौभाग्य से मेरे पास आये हो। बेटा! तुम्हारा स्वाध्याय और तप तो सदैव अच्छा चलता रहता है न? तुम सदैव कठोर तप में लगे रहते हो; इसीलिए मैं तुमसे बार-बार तप के विषय में पूछता हूँ॥ 15-16॥
श्लोक 17: रुद्र बोले - हे प्रभु ! आपकी कृपा से मेरा अध्ययन और ध्यान अच्छी तरह चल रहा है; उसमें कभी बाधा नहीं आई। सम्पूर्ण जगत् भी कुशलपूर्वक है॥17॥
श्लोक 18: प्रभु! ब्रह्मलोक में आपको देखे हुए मुझे बहुत समय हो गया है। इसीलिए आज मैं आपके चरणों से सेवित इस पर्वत पर पुनः आपके दर्शन करने आया हूँ॥ 18॥
श्लोक 19: दादाजी! आपके एकांत में जाने से मेरी जिज्ञासा जागृत हुई। मैंने सोचा कि इसका कोई छोटा-मोटा कारण अवश्य होगा।॥19॥
श्लोक 20-21: आप किस कारण से उस महान धाम को छोड़कर, जो भूख-प्यास से रहित है, जहाँ देवता, दानव, अत्यंत तेजस्वी ऋषिगण, गन्धर्व और अप्सराओं के समूह निरन्तर आपकी सेवा में उपस्थित रहते हैं, अकेले ही इस महान पर्वत पर आये हैं?॥ 20-21॥
श्लोक 22: ब्रह्माजी बोले - बेटा ! इन दिनों मैं वैजयन्त पर्वत शिखर पर निरन्तर भ्रमण कर रहा हूँ, इसका कारण यह है कि मैं यहाँ एकाग्रचित्त होकर विराट् पुरुष का चिंतन करता हूँ ॥ 22॥
श्लोक 23: रुद्र बोले- ब्रह्मन्! आप स्वयंभू हैं। आपने बहुत से पुरुषों को उत्पन्न किया है और अभी भी अन्य पुरुषों को उत्पन्न कर रहे हैं। वह विराट भी पुरुष है, फिर उसमें क्या विशेष बात है?॥23॥
श्लोक 24: प्रभु! आप किस पुरुषोत्तम का चिंतन करते हैं? कृपया मेरे इस संदेह का निवारण करें। मैं यह सुनने के लिए अत्यंत उत्सुक हूँ॥ 24॥
श्लोक 25: ब्रह्माजी बोले, "पुत्र! तुमने जिन अनेक पुरुषों का उल्लेख किया है, वह ठीक है। मैं जिन्हें उत्पन्न करता हूँ, उनके विषय में क्यों सोचूँगा?"
श्लोक 26: मैं तुम्हें उस एक के विषय में बताऊँगा जो सबका आधार है और वह अनेक प्राणियों का एकमात्र कारण कहा गया है ॥26॥
श्लोक 27: जो लोग साधना के द्वारा गुणों से परे चले जाते हैं, वे ही उस विराट् स्वरूप में, उस अनन्त महान्, सनातन और निर्गुण परब्रह्म में प्रवेश करते हैं ॥27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥