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वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान व्यासजी के ऐसा कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने कुछ देर विचार किया और फिर तपस्वी व्यासजी से यह कहा।
Vaishmpayana says - Janamejaya! When Lord Vyasa said this, Dharmaraja Yudhishthira thought for a while and then said the following to the ascetic Vyasa. 51.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तीये पञ्चत्रिंशोऽध्याय:॥ ३५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तवर्णनके प्रसङ्गमें पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥