श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.35.51 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो भगवता धर्मराजो युधिष्ठिर:।
चिन्तयित्वा मुहूर्तेन प्रत्युवाच तपोधनम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान व्यासजी के ऐसा कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने कुछ देर विचार किया और फिर तपस्वी व्यासजी से यह कहा।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! When Lord Vyasa said this, Dharmaraja Yudhishthira thought for a while and then said the following to the ascetic Vyasa. 51.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तीये पञ्चत्रिंशोऽध्याय:॥ ३५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तवर्णनके प्रसङ्गमें पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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