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श्लोक 12.35.47  |
नास्तिकाश्रद्दधानेषु पुरुषेषु कदाचन।
दम्भद्वेषप्रधानेषु विधिरेष न दृश्यते॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| ऐसा प्रायश्चित उन नास्तिकों और श्रद्धाहीन मनुष्यों के लिए कभी नहीं देखा जाता जिनमें अहंकार और द्वेष की प्रधानता होती है ॥47॥ |
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| Such atonement is never seen for those atheists and faithless men in whom arrogance and hatred predominate. ॥ 47॥ |
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