श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  12.35.38-39 
अह:सु सततं तिष्ठेदभ्याकाशं निशां स्वपन्।
त्रिरह्नि त्रिर्निशायां च सवासा जलमाविशेत्॥ ३८॥
स्त्रीशूद्रं पतितं चापि नाभिभाषेद् व्रतान्वित:।
पापान्यज्ञानत: कृत्वा मुच्येदेवंव्रतो द्विज:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि दिन में खड़ा रहे, रात्रि में खुले में सोए, दिन में तीन बार और रात्रि में तीन बार जल में वस्त्र सहित स्नान करे तथा इस व्रत को करते हुए स्त्री, शूद्र तथा पतित व्यक्ति से बात न करे। ऐसा व्रत करने वाला द्विज पुरुष अज्ञानवश किए गए समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥38-39॥
 
A man should stand during the day, sleep in the open at night, bathe three times during the day and three times at night with his clothes on in water, and while observing this fast he should not talk to a woman, a Shudra or a fallen person. A twice-born person who takes such a vow becomes free from all the sins committed due to ignorance. ॥38-39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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