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mahabharat 12.35.23: जो मनुष्य झूठ बोलकर जीविका चलाता है और गुरु का अनादर करता है, यदि वह अपने गुरु को इच्छित वस्तु देकर प्रसन्न कर ले, तो वह उस पाप से मुक्त हो जाता है ॥ 23॥   |   mahabharat अध्याय 12.35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.35.23 
अनृतेनोपवर्ती चेत् प्रतिरोद्धा गुरोस्तथा।
उपाहृत्य प्रियं तस्मै तस्मात् पापात् प्रमुच्यते॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य झूठ बोलकर जीविका चलाता है और गुरु का अनादर करता है, यदि वह अपने गुरु को इच्छित वस्तु देकर प्रसन्न कर ले, तो वह उस पाप से मुक्त हो जाता है ॥ 23॥
 
A person who earns his living by telling lies and who disrespects his Guru, if he pleases his Guru by giving him anything he desires, he is freed from that sin. ॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)