श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.35.17 
मरुप्रपातं प्रपतन् ज्वलनं वा समाविशन्।
महाप्रस्थानमातिष्ठन् मुच्यते सर्वकिल्बिषै:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
निर्जल देश में पर्वत से गिरकर अथवा अग्नि में प्रवेश करके अथवा महाप्रस्थान करते हुए हिमालय में गलकर प्राण त्यागने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥17॥
 
By falling from a mountain in a waterless country or by entering fire or by melting in the Himalayas in the process of Mahaprasthan and giving up one's life, a person gets rid of all sins. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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