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mahabharat 12.35.16: जो एक बार मदिरा पीकर फिर अग्नि के समान तपी हुई मदिरा पीता है, वह इस लोक में भी पवित्र हो जाता है और परलोक में भी पवित्र हो जाता है ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.35.16 
सुरापानं सकृत् कृत्वा योऽग्निवर्णां सुरां पिबेत्।
स पावयत्यथात्मानमिह लोके परत्र च॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जो एक बार मदिरा पीकर फिर अग्नि के समान तपी हुई मदिरा पीता है, वह इस लोक में भी पवित्र हो जाता है और परलोक में भी पवित्र हो जाता है ॥16॥
 
He who drinks wine once and then drinks wine heated like fire, purifies himself in this world as well as the next. ॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)