श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.35.15 
मनोरथं तु यो दद्यादेकस्मा अपि भारत।
न कीर्तयेत दत्त्वा य: स च पापात् प्रमुच्यते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे भरतपुत्र! जो मनुष्य ब्राह्मण को भी इच्छित वस्तु दे देता है और देने के बाद उसका कहीं उल्लेख नहीं करता, वह भी पापों से मुक्त हो जाता है॥15॥
 
O son of Bharat! Whoever gives a desired object to even a Brahmin and does not mention it anywhere after giving it, he too becomes free from sins. ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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