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mahabharat 12.35.10-11: जो मनुष्य युद्ध में ब्राह्मण के लिए प्राण त्यागता है, वह भी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य ब्रह्महत्यारा भी हो, तो भी जो योग्य ब्राह्मणों को एक लाख गौएँ दान करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  12.35.10-11 
ब्राह्मणार्थे हतो युद्धे मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ १०॥
गवां शतसहस्रं तु पात्रेभ्य: प्रतिपादयेत् ।
ब्रह्महा विप्रमुच्येत सर्वपापेभ्य एव च॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य युद्ध में ब्राह्मण के लिए प्राण त्यागता है, वह भी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य ब्रह्महत्यारा भी हो, तो भी जो योग्य ब्राह्मणों को एक लाख गौएँ दान करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
 
The man who sacrifices his life for a Brahmin in battle is also freed from the sin of killing a brahmin. Even if he is a brahmin-killer, he who donates one lakh cows to deserving Brahmins is freed from all sins. 10-11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)