| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन » श्लोक 1 |
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| | | | श्लोक 12.35.1  | व्यास उवाच
तपसा कर्मणा चैव प्रदानेन च भारत।
पुनाति पापं पुरुष: पुनश्चेन्न प्रवर्तते॥ १॥ | | | | | | अनुवाद | | व्यासजी बोले, "भरतनन्दन! मनुष्य तप, यज्ञ तथा अन्य शुभ कर्मों के द्वारा तथा दान देकर अपने पापों को धोकर पवित्र हो जाता है, किन्तु यह तभी संभव है, जब वह पुनः पाप में प्रवृत्त न हो।" ॥1॥ | | | | Vyasa said, "Bharatanandan! A man purifies himself by washing away his sins through penance, yajna and other good deeds and by giving charity, but this is possible only when he does not indulge in sin again." ॥ 1॥ | | ✨ ai-generated | | |
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