श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 349: व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा  »  श्लोक 68-69
 
 
श्लोक  12.349.68-69 
पाञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वेत्ता तु भगवान् स्वयम्।
सर्वेषु च नृपश्रेष्ठ ज्ञानेष्वेतेषु दृश्यते॥ ६८॥
यथागमं यथाज्ञानं निष्ठा नारायण: प्रभु:।
न चैनमेवं जानन्ति तमोभूता विशाम्पते॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
हे श्रेष्ठ! सम्पूर्ण पंचरात्र के वास्तविक ज्ञाता भगवान नारायण ही हैं। यदि हम वेद और अनुभव के अनुसार विचार करें, तो इन समस्त विद्याओं में भगवान नारायण ही अपने परमार्थ में विद्यमान दिखाई देते हैं। प्रजानाथ! जो लोग अज्ञान में डूबे हुए हैं, वे भगवान श्रीहरि को इस रूप में नहीं जानते। 68-69॥
 
The best! Only Lord Narayana is the real knower of the entire Pancharatra. If we think according to Vedas and experience, then in all these knowledge, only Lord Narayana is seen to be present in their ultimate meaning. Prajanath! Those people who are immersed in ignorance do not know Lord Sri Hari in this form. 68-69॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)