श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 349: व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  12.349.6-7 
जनमेजय उवाच
त्वयैव कथितं पूर्वं सम्भवे द्विजसत्तम।
वसिष्ठस्य सुत: शक्ति: शक्तिपुत्र: पराशर:॥ ६॥
पराशरस्य दायाद: कृष्णद्वैपायनो मुनि:।
भूयो नारायणसुतं त्वमेवैनं प्रभाषसे॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले, "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आदिपर्व की कथा सुनाते समय आपने ही कहा था कि वशिष्ठ के पुत्र शक्ति थे, शक्ति के पुत्र पराशर थे और पराशर के पुत्र ऋषि श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास थे। और अब आप पुनः उन्हें नारायण के पुत्र कह रहे हैं।
 
Janamejaya said, "O best of the Brahmins! While narrating the tale of the Adi-parva, you yourself had said earlier that Vasishtha's son was Shakti, Shakti's son was Parashara and Parashara's son was the sage Sri Krishna Dwaipayana Vyasa. And now once again you are calling them Narayan's sons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)