श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 349: व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.349.54 
अनादिनिधनं लोके चक्रहस्तं च मां मुने।
अनुध्यानान्मम मुने नैतद् वचनमन्यथा॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
"मुनि! निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए तुम मुझ सनातन और अनन्त परमेश्वर को हाथ में चक्र धारण करते हुए देखोगे। मेरा यह कथन कभी मिथ्या नहीं होगा ॥ 54॥
 
"Muni! By constantly thinking of me you will see me, the eternal and infinite Supreme Lord, holding the discus in my hand. This statement of mine will never be false. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)