श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 349: व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  12.349.42-43 
तेन भिन्नास्तदा वेदा मनो: स्वायम्भुवेऽन्तरे।
ततस्तुतोष भगवान् हरिस्तेनास्य कर्मणा॥ ४२॥
तपसा च सुतप्तेन यमेन नियमेन च।
मन्वन्तरेषु पुत्रत्वमेवमेव प्रवर्तक:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
अपान्तरात्मने स्वायम्भुव मन्वन्तर में भगवान की आज्ञा से वेदों का विभाग किया। भगवान श्रीहरि उसके कर्म तथा उसके द्वारा किए गए उत्तम तप, यम और नियम से अत्यन्त संतुष्ट हुए और बोले - 'पुत्र! इसी प्रकार तुम समस्त मन्वन्तरों में धर्म के प्रवर्तक रहोगे।'
 
‘Apantaratmane divided the Vedas as per the order of God in Swayambhuva Manvantara. Lord Shri Hari was very satisfied with his actions and the excellent penance, Yama and Niyama performed by him and said - 'Son! Similarly, you will be the promoter of religion in all the Manvantaras.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)