श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 349: व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा  »  श्लोक 36-38h
 
 
श्लोक  12.349.36-38h 
तस्मात् पृथ्व्या: परित्राणं करिष्ये सम्भवं गत:।
एवं स चिन्तयित्वा तु भगवान् मधुसूदन:॥ ३६॥
रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावे भवाय स:।
वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा॥ ३७॥
एभिर्मया निहन्तव्या दुर्विनीता: सुरारय:।
 
 
अनुवाद
अतः मैं अवश्य ही अवतार लेकर इस पृथ्वी की रक्षा करूँगा।' ऐसा विचार करके भगवान मधुसूदन ने संसार के लिए अवतार लेने हेतु अपने अनेक रूप रचे, अर्थात् उन्होंने वराह, नरसिंह, वामन और मानव रूप का स्मरण किया। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि इन अवतारों के माध्यम से उन्हें अभिमानी दैत्यों का संहार करना है।
 
‘Therefore I will definitely take incarnation and protect this earth.’ Thinking this, Lord Madhusudana created many forms of himself to take incarnation for the world, that is, he remembered Varaah, Narasimha, Vaman and human forms. He had decided that he has to kill the arrogant demons through these incarnations. 36-37 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)