श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 349: व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.349.28 
प्राप चैनं मुहूर्तेन संस्थानं देवसंज्ञितम्।
तां चैव प्रकृतिं प्राप्य एकीभावगतोऽभवत्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
उसी क्षण वे अपने धाम पहुँच गए और अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करके उसके साथ एकाकार हो गए॥28॥
 
In the same moment they reached their abode, and having attained their true nature, became one with it.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)