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mahabharat 12.348.9: मैंने पहले ही तुमसे गति और अगति का स्वरूप कहा था। यह धर्म अत्यन्त गहन है और अजेय आत्मा वाले पुरुषों के लिए दुर्गम है॥9॥   |   mahabharat अध्याय 12.348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.348.9 
अगतिश्च गतिश्चैव पूर्वं ते कथिता मया।
गहनो ह्येष धर्मो वै दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभि:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
मैंने पहले ही तुमसे गति और अगति का स्वरूप कहा था। यह धर्म अत्यन्त गहन है और अजेय आत्मा वाले पुरुषों के लिए दुर्गम है॥9॥
 
I had earlier told you about the nature of movement and non-movement. This Dharma is profound and inaccessible to men with unconquered souls.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)