श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  12.348.87 
इत्थं हि दुश्चरो धर्म एष पार्थिवसत्तम।
यथैव त्वं तथैवान्ये भवन्तीह विमोहिता:॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
हे राजनश्रेष्ठ! यह धर्म अत्यन्त कठिन है। तुम्हारी तरह अन्य लोग भी इससे मोहित हो जाते हैं।
 
O best of kings! This religion is very difficult. Like you, other people also get fascinated by it. 87.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)