श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  12.348.83 
यथा समुद्रात् प्रसृता जलौघा-
स्तमेव राजन् पुनराविशन्ति।
इमे तथा ज्ञानमहाजलौघा
नारायणं वै पुनराविशन्ति॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! जैसे समस्त जलधाराएँ समुद्र से निकलकर पुनः उसी समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही ज्ञानरूपी जल की महान् धाराएँ भगवान नारायण से निकलकर पुनः उन्हीं में मिल जाती हैं ॥ 83॥
 
O King! Just as all the water flows originate from the ocean and then merge back into that ocean, similarly the great flows of the water of knowledge emerge from Lord Narayana and then merge back into him. ॥ 83॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)