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mahabharat 12.348.81-82: इस प्रकार आत्मा और अनात्मा का विवेक बताने वाला सांख्य, चित्तवृत्तियों के निग्रह का उपदेश देने वाला योग, जीव और ब्रह्म की अभेदता का बोध कराने वाला वेदों का आरण्यकभाग (उपनिषद्) तथा भक्तिमार्ग का प्रतिपादन करने वाला पांचरात्र आगम, ये सब शास्त्र एक ही लक्ष्य की प्राप्ति के कारण एक कहे गए हैं। ये सब एक-दूसरे के अंग हैं। एकान्तवासी भक्तों का धर्म है कि वे अपने समस्त कर्मों को भगवान नारायण के चरणों में समर्पित कर दें। 81-82॥   |   mahabharat अध्याय 12.348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 81-82
 
 
श्लोक  12.348.81-82 
एवमेकं सांख्ययोगं वेदारण्यकमेव च॥ ८१॥
परस्पराङ्गान्येतानि पाञ्चरात्रं च कथ्यते।
एष एकान्तिनां धर्मो नारायणपरात्मक:॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार आत्मा और अनात्मा का विवेक बताने वाला सांख्य, चित्तवृत्तियों के निग्रह का उपदेश देने वाला योग, जीव और ब्रह्म की अभेदता का बोध कराने वाला वेदों का आरण्यकभाग (उपनिषद्) तथा भक्तिमार्ग का प्रतिपादन करने वाला पांचरात्र आगम, ये सब शास्त्र एक ही लक्ष्य की प्राप्ति के कारण एक कहे गए हैं। ये सब एक-दूसरे के अंग हैं। एकान्तवासी भक्तों का धर्म है कि वे अपने समस्त कर्मों को भगवान नारायण के चरणों में समर्पित कर दें। 81-82॥
 
In this way, Sankhya, which gives discrimination between soul and non-soul, Yoga, which preaches control of mental tendencies, Aranyakabhag (Upanishad) of Vedas, which gives understanding of the indistinguishability of Jiva and Brahma, and Pancharatra Agama, which propounds the path of Bhakti, all these scriptures are said to be one because they are the pursuit of one goal. These are all parts of each other. It is the religion of solitary devotees to dedicate all their deeds to the feet of Lord Narayana. 81-82॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)