श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 80-81h
 
 
श्लोक  12.348.80-81h 
वैशम्पायन उवाच
सुसूक्ष्मं सत्त्वसंयुक्तं संयुक्तं त्रिभिरक्षरै:॥ ८०॥
पुरुष: पुरुषं गच्छेन्निष्क्रिय: पञ्चविंशक:।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले - पच्चीसवाँ तत्त्वरूप पुरुष (आत्मा) कर्तापन के अहंकार से शून्य होकर परम पुरुष परमात्मा को प्राप्त होता है, जो अत्यंत सूक्ष्म, सत्त्वगुण से युक्त तथा अकार, उकार और मकार इन तीन अक्षरों से युक्त है। 80 1/2॥
 
Vaishampayanaji said - The twenty-fifth Tattva form Purusha (soul) attains the Supreme Purusha Paramatma, which is extremely subtle, combined with Sattva guna and consisting of the three letters Aakar, Ukaar and Makar, when he becomes void of the ego of the doer. 80 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)