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mahabharat 12.348.74: एकान्तवासी भक्तों द्वारा किया गया धर्म सांख्य और योग के समान है। उसका सेवन करके मनुष्य नारायण रूप मोक्षरूप परमपद को प्राप्त होता है। 74॥   |   mahabharat अध्याय 12.348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  12.348.74 
सांख्ययोगेन तुल्यो हि धर्म एकान्तसेवित:।
नारायणात्मके मोक्षे ततो यान्ति परां गतिम्॥ ७४॥
 
 
अनुवाद
एकान्तवासी भक्तों द्वारा किया गया धर्म सांख्य और योग के समान है। उसका सेवन करके मनुष्य नारायण रूप मोक्षरूप परमपद को प्राप्त होता है। 74॥
 
Dharma served by solitary devotees is equivalent to Sankhya and Yoga. By consuming it, man attains the supreme state of salvation in the form of Narayana. 74॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)