श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  12.348.71 
मनीषितं च प्राप्नोति चिन्तयन् पुरुषोत्तमम्।
एकान्तभक्ति: सततं नारायणपरायण:॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
भगवान नारायण का अनन्य भक्त, जो उन पर आश्रित है, अपने मन में निरंतर उन इच्छित भगवान का ध्यान करके परम पुरुषोत्तम को प्राप्त करता है ॥ 71॥
 
An exclusive devotee of Lord Narayana, who is dependent on Him, attains the Supreme Lord Purushottama by constantly meditating on Him, the desired Lord in his mind. ॥ 71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)