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जनमेजय उवाच
एवं बहुविधं धर्मं प्रतिबुद्धैर्निषेवितम्।
न कुर्वन्ति कथं विप्रा अन्ये नानाव्रते स्थिता:॥ ६७॥
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - "मुनि! यह धर्म, जो अनेक गुणों से युक्त है और बुद्धिमान पुरुषों द्वारा पालन किया जाता है, नाना प्रकार के व्रतों में लगे हुए अन्य ब्राह्मणों द्वारा आचरण में क्यों नहीं लाया जाता?" ॥67॥
Janamejaya asked, "Muni! Why is this Dharma, which is full of many virtues and is served by wise men, not put into practice by other Brahmins who are engaged in various types of vows?" ॥ 67॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥