श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 62-63
 
 
श्लोक  12.348.62-63 
एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप।
यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत‍् स्यात् कुरुनन्दन॥ ६२॥
अहिंसकैरात्मविद्भि: सर्वभूतहिते रतै:।
भवेत् कृतयुगप्राप्तिराशी: कर्मविवर्जिता॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! भगवान् के अनन्य भक्त दुर्लभ हैं, क्योंकि ऐसे पुरुष बहुत नहीं होते। कुरुनन्दन! यदि संसार ऐसे ज्ञानी, अहिंसक और अनन्य भक्तों से भरा हो जो सब प्राणियों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, तो सर्वत्र सत्ययुग छा जाएगा और कहीं भी सकाम कर्मों का अनुष्ठान नहीं होगा। 62-63॥
 
Nareshwar! Dedicated devotees of God are rare, because such men are not many. Kurunandan! If the world is filled with enlightened, non-violent and exclusive devotees who are always ready for the welfare of all beings, then Satyayuga will prevail everywhere and there will be no ritual of fruitive actions anywhere. 62-63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)