श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  12.348.61 
एष एकान्तधर्मस्ते कीर्तितो नृपसत्तम।
मया गुरुप्रसादेन दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभि:॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
हे राजनश्रेष्ठ! मैंने गुरु की कृपा से जो अनन्य भक्तिरूप धर्म सीखा है, वह मैंने तुमसे कहा है। जिनका हृदय शुद्ध नहीं है, उनके लिए इस धर्म को जानना अत्यन्त कठिन है ॥ 61॥
 
O best of kings! I have told you about the religion of exclusive devotion which I have learnt by the grace of my Guru. It is very difficult for those whose hearts are not pure to know this religion. ॥ 61॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)