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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा
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श्लोक 60
श्लोक
12.348.60
अकर्ता चैव कर्ता च कार्यं कारणमेव च।
यथेच्छति तथा राजन् क्रीडते पुरुषोऽव्यय:॥ ६०॥
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! ये अविनाशी पुरुष नारायण अकर्ता, कर्ता, कर्म और कारण हैं। वे अपनी इच्छानुसार लीला करते हैं॥60॥
O Lord of men! This imperishable Purusha Narayana is the non-doer, the doer, the action and the cause. He plays as He pleases.॥ 60॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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