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mahabharat 12.348.58: भगवान श्रीहरि क्षेत्रज्ञ, ममता से रहित और शुद्ध हैं। वे पाँच भौतिक गुणों से परे आत्मा रूप में सभी जीवों में विद्यमान हैं ॥58॥   |   mahabharat अध्याय 12.348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  12.348.58 
हरिरेव हि क्षेत्रज्ञो निर्ममो निष्कलस्तथा।
जीवश्च सर्वभूतेषु पञ्चभूतगुणातिग:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीहरि क्षेत्रज्ञ, ममता से रहित और शुद्ध हैं। वे पाँच भौतिक गुणों से परे आत्मा रूप में सभी जीवों में विद्यमान हैं ॥58॥
 
Lord Sri Hari is the expert of the field, free from affection and pure. He is present in all living beings in the form of a soul beyond the five physical qualities. 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)