श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.348.57 
एकव्यूहविभागो वा क्वचिद् द्विर्व्यूहसंज्ञित:।
त्रिर्व्यूहश्चापि संख्यातश्चतुर्व्यूहश्च दृश्यते॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी केवल एक ही व्यूह की पूजा - भगवान वासुदेव की, कभी-कभी दो व्यूहों की - वासुदेव और संकर्षण की, कभी प्रद्युम्न सहित तीन व्यूहों की और कभी अनिरुद्ध सहित चार व्यूहों की पूजा भगवान के भक्तों द्वारा की जाती देखी जाती है।
 
Sometimes the worship of only one array - that of Lord Vasudeva, sometimes of two arrays - that of Vasudeva and Sankarshana, sometimes of three arrays including Pradyumna and sometimes of four arrays including Aniruddha is seen being done by the devotees of the Lord.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)