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mahabharat 12.348.55: राजन्! यह आदि एवं महान् धर्म अनादि काल से चला आ रहा है। दूसरों के लिए इसे समझना कठिन एवं दुष्कर है। भगवान के भक्त सदैव इसी धर्म का पालन करते हैं ॥ 55॥   |   mahabharat अध्याय 12.348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.348.55 
एवमेष महान् धर्म आद्यो राजन् सनातन:।
दुर्विज्ञेयो दुष्करश्च सात्वतैर्धार्यते सदा॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
राजन्! यह आदि एवं महान् धर्म अनादि काल से चला आ रहा है। दूसरों के लिए इसे समझना कठिन एवं दुष्कर है। भगवान के भक्त सदैव इसी धर्म का पालन करते हैं ॥ 55॥
 
King! This original and great religion has been in existence since time immemorial. It is difficult and hard for others to understand. Devotees of God always follow this religion. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)