श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.348.54 
नारदेन सुसम्प्राप्त: सरहस्य: ससंग्रह:।
एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
महाराज! नारदजी ने जगदीश्वर नारायण से इस धर्म को, इसके रहस्य और संग्रह सहित, भली-भाँति प्राप्त कर लिया था ॥54॥
 
Maharaj! Naradji had received this religion along with its secrets and collections very well from Jagdishwar Narayan. 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)