vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा
»
श्लोक 54
श्लोक
12.348.54
नारदेन सुसम्प्राप्त: सरहस्य: ससंग्रह:।
एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप॥ ५४॥
अनुवाद
महाराज! नारदजी ने जगदीश्वर नारायण से इस धर्म को, इसके रहस्य और संग्रह सहित, भली-भाँति प्राप्त कर लिया था ॥54॥
Maharaj! Naradji had received this religion along with its secrets and collections very well from Jagdishwar Narayan. 54॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×