श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  12.348.48-49 
यदिदं सप्तमं जन्म पद्मजं ब्रह्मणो नृप।
तत्रैष धर्म: कथित: स्वयं नारायणेन ह॥ ४८॥
पितामहाय शुद्धाय युगादौ लोकधारिणे।
पितामहश्च दक्षाय धर्ममेतं पुरा ददौ॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! भगवान ब्रह्मा की नाभि से ब्रह्माजी का यह सातवाँ जन्म है, इसमें स्वयं नारायण ने कल्प के आदि में जगत् दाता के शुद्धस्वरूप ब्रह्मा को इस धर्म का उपदेश दिया था; फिर भगवान ब्रह्मा ने सबसे पहले प्रजापति दक्ष को इस धर्म का उपदेश दिया था॥48-49॥
 
Nareshwar! This is the seventh birth of Brahmaji from the navel of Lord Brahma, in this, Narayana himself preached this religion to Brahma, the pure form of the world giver, at the beginning of the Kalpa; Then Lord Brahma first taught this religion to Prajapati Daksh. 48-49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)