श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.348.44 
अण्डजे जन्मनि पुनर्ब्रह्मणे हरियोनये।
एष धर्म: समुद्भूतो नारायणमुखात् पुन:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर जब ब्रह्माजी का छठा जन्म अण्डे से हुआ, तब यह धर्म पुनः भगवान् से उत्पन्न ब्रह्माजी के लिए भगवान् नारायण के मुख से प्रकट हुआ ॥ 44॥
 
Thereafter when the sixth birth of Brahma took place from an egg, then this Dharma was once again revealed from the mouth of Lord Narayana for Brahma, who was born from the Supreme Lord. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)