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mahabharat 12.348.4: निस्सन्देह, निष्काम भक्ति से भगवान का पूजन करने वाला यह धर्म सर्वश्रेष्ठ है और श्री नारायण को अत्यंत प्रिय है; क्योंकि इसका आश्रय लेने वाले भक्त उपर्युक्त तीन गतियों को प्राप्त नहीं होते, अपितु सीधे चौथी गति को प्राप्त होते हैं और अविनाशी श्री हरि को प्राप्त होते हैं॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.348.4 
नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रिय:।
अगत्वा गतयस्तिस्रो यद् गच्छत्यव्ययं हरिम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
निस्सन्देह, निष्काम भक्ति से भगवान का पूजन करने वाला यह धर्म सर्वश्रेष्ठ है और श्री नारायण को अत्यंत प्रिय है; क्योंकि इसका आश्रय लेने वाले भक्त उपर्युक्त तीन गतियों को प्राप्त नहीं होते, अपितु सीधे चौथी गति को प्राप्त होते हैं और अविनाशी श्री हरि को प्राप्त होते हैं॥4॥
 
Indeed, this religion of worshipping the Lord with unconditional devotion is the best and is most dear to Shri Narayan; because devotees who take refuge in this do not attain the above mentioned three states, but reach directly to the fourth state and attain the imperishable Shri Hari. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)