श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  12.348.31-32h 
उपदिश्य ततो धर्मं ब्रह्मणेऽमिततेजसे॥ ३१॥
त्वं कर्ता युगधर्माणां निराशी: कर्मसंज्ञितम्।
 
 
अनुवाद
भगवान् ने अत्यन्त तेजस्वी ब्रह्माजी को इस धर्म का उपदेश देकर उनसे कहा, "तुम निष्काम भाव से सम्पूर्ण कर्म करते हुए युगधर्मों के प्रवर्तक बनो।" ॥31 1/2॥
 
After preaching this religion to the immensely radiant Brahma, the Lord said to him, "Become the promoter of the Yuga-dharmas by performing all actions without any selfish motive." ॥31 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)