vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा
»
श्लोक 26
श्लोक
12.348.26
जगत्स्रष्टुमना देवो हरिर्नारायण: स्वयम्।
चिन्तयामास पुरुषं जगत्सर्गकरं प्रभुम्॥ २६॥
अनुवाद
वास्तव में जगत् की रचना करने की इच्छा से भगवान नारायण हरि ने एक ऐसे पुरुष का विचार किया जो जगत् की रचना करने में पूर्णतः समर्थ हो ॥26॥
Actually, with the desire to create the world, Lord Narayan Hari thought of a man who would be completely capable of creating the world. 26॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×