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mahabharat 12.348.22-23h: ऋग्वेद के पाठ में यह दुष्ट धर्म स्पष्ट रूप से पढ़ा जाता है। नरश्रेष्ठ! इस जगत के प्राणरूप वायु ने सुपर्ण से उस सनातन धर्म को प्राप्त किया। 22 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  12.348.22-23h 
ऋग्वेदपाठपठितं व्रतमेतद्धि दुश्चरम्।
सुपर्णाच्चाप्यधिगतो धर्म एष सनातन:॥ २२॥
वायुना द्विपदां श्रेष्ठ कथितो जगदायुषा।
 
 
अनुवाद
ऋग्वेद के पाठ में यह दुष्ट धर्म स्पष्ट रूप से पढ़ा जाता है। नरश्रेष्ठ! इस जगत के प्राणरूप वायु ने सुपर्ण से उस सनातन धर्म को प्राप्त किया। 22 1/2॥
 
This evil religion is clearly read in the text of Rigveda. Narashrestha! Vayu, the life form of this world, received that eternal religion from Suparna. 22 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)