श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.348.1 
जनमेजय उवाच
अहो ह्येकान्तिन: सर्वान् प्रीणाति भगवान् हरि:।
विधिप्रयुक्तां पूजां च गृह्णाति भगवान् स्वयम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले - ब्रह्मन् ! भगवान भक्तिपूर्वक पूजन करने वाले सभी भक्तों पर प्रसन्न होते हैं और उनकी विधिपूर्वक की गई पूजा को स्वीकार करते हैं। यह कैसा आनंद है ! 1॥
 
Janamejaya said – Brahman! God pleases all the devotees who worship with devotion and accepts their duly performed worship. What a joy this is! 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)