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mahabharat 12.347.82: नारायण ही सत्य का परम लक्ष्य हैं। ऋत ही नारायण का स्वरूप है। भगवान नारायण ही उस धर्म के परम लक्ष्य हैं, जिसके आचरण से पुनर्जन्म नहीं होता ॥82॥   |   mahabharat अध्याय 12.347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  12.347.82 
नारायणपरं सत्यमृतं नारायणात्मकम्।
नारायणपरो धर्म: पुनरावृत्तिदुर्लभ:॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
नारायण ही सत्य का परम लक्ष्य हैं। ऋत ही नारायण का स्वरूप है। भगवान नारायण ही उस धर्म के परम लक्ष्य हैं, जिसके आचरण से पुनर्जन्म नहीं होता ॥82॥
 
Narayana is the ultimate goal of truth. Rita is the form of Narayana. Lord Narayana is the ultimate goal of that religion whose conduct does not lead to rebirth. 82॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)