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mahabharat 12.347.56-57h: उस ध्वनि को सुनकर दोनों राक्षसों ने वेदों को काल के पाश से बाँधकर रसातल में फेंक दिया और स्वयं उस दिशा में दौड़ पड़े, जिधर से वह ध्वनि आ रही थी।   |   mahabharat अध्याय 12.347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 56-57h
 
 
श्लोक  12.347.56-57h 
ततस्तावसुरौ कृत्वा वेदान् समयबन्धनान्॥ ५६॥
रसातले विनिक्षिप्य यत: शब्दस्ततो द्रुतौ।
 
 
अनुवाद
उस ध्वनि को सुनकर दोनों राक्षसों ने वेदों को काल के पाश से बाँधकर रसातल में फेंक दिया और स्वयं उस दिशा में दौड़ पड़े, जिधर से वह ध्वनि आ रही थी।
 
On hearing that sound, the two demons bound the Vedas with the noose of time and threw them into the abyss and themselves ran in the direction from where the sound was coming. 56 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)