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mahabharat 12.347.51-52: चन्द्रमा और सूर्य, उनके दोनों नेत्र और नासिकाएँ संध्यामय हो गईं। ओंकार संस्कार (आभूषण) और विद्युत् जिह्वा बनी। राजन! सोम पीने वाले पितरों के दाँत सुनाई देने लगे और गोलोक तथा ब्रह्मलोक उन महात्मा के ओष्ठ बन गए। 51-52॥   |   mahabharat अध्याय 12.347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  12.347.51-52 
चक्षुषी सोमसूर्यौ ते नासा संध्या पुन: स्मृता।
ॐ कारस्त्वथ संस्कारो विद्युज्जिह्वा च निर्मिता॥ ५१॥
दन्ताश्च पितरो राजन् सोमपा इति विश्रुता:।
गोलोको ब्रह्मलोकश्च ओष्ठावास्तां महात्मन:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
चन्द्रमा और सूर्य, उनके दोनों नेत्र और नासिकाएँ संध्यामय हो गईं। ओंकार संस्कार (आभूषण) और विद्युत् जिह्वा बनी। राजन! सोम पीने वाले पितरों के दाँत सुनाई देने लगे और गोलोक तथा ब्रह्मलोक उन महात्मा के ओष्ठ बन गए। 51-52॥
 
Moon and Sun, both their eyes and nostrils, were evening. Omkar sanskar (jewellery) and electric tongue were made. Rajan! The teeth of the ancestors who drank Soma were heard and Golok and Brahmalok were the lips of that Mahatma. 51-52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)