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mahabharat 12.347.47-48: अपने ऐश्वर्य के कारण उन्होंने दूसरा शरीर धारण किया, जो चन्द्रमा के समान तेजस्वी था। सुन्दर नासिका वाले शरीर वाले भगवान् घोड़े के समान गर्दन और मुख से युक्त थे। उनका वह पवित्र मुख सम्पूर्ण वेदों का आश्रय था। 47-48॥   |   mahabharat अध्याय 12.347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 47-48
 
 
श्लोक  12.347.47-48 
ऐश्वर्येण प्रयोगेण द्वितीयां तनुमास्थित:॥ ४७॥
सुनासिकेन कायेन भूत्वा चन्द्रप्रभस्तदा।
कृत्वा हयशिर: शुभ्रं वेदानामालयं प्रभु:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
अपने ऐश्वर्य के कारण उन्होंने दूसरा शरीर धारण किया, जो चन्द्रमा के समान तेजस्वी था। सुन्दर नासिका वाले शरीर वाले भगवान् घोड़े के समान गर्दन और मुख से युक्त थे। उनका वह पवित्र मुख सम्पूर्ण वेदों का आश्रय था। 47-48॥
 
Due to his opulence, he assumed another body, which was as radiant as the moon. The Lord, having a body with beautiful nose, was situated with a neck and mouth like that of a horse. That pure mouth of his was the sanctuary of the entire Vedas. 47-48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)