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mahabharat 12.347.2-3h: हे निष्पाप पुत्र! प्राचीन काल में भगवान महावराह ने पिंडों की रचना की और पिंडदान की परंपरा का निर्वाह किया तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति के संबंध में जो भी विधि उन्होंने सोची, वह सब मैंने तुम्हारे मुख से सुनी है। 2 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 2-3h
 
 
श्लोक  12.347.2-3h 
महावराहसृष्टा च पिण्डोत्पत्ति: पुरातनी।
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यो यथा परिकल्पित:॥ २॥
तथा च न: श्रुतो ब्रह्मन् कथ्यमानस्त्वयानघ।
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप पुत्र! प्राचीन काल में भगवान महावराह ने पिंडों की रचना की और पिंडदान की परंपरा का निर्वाह किया तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति के संबंध में जो भी विधि उन्होंने सोची, वह सब मैंने तुम्हारे मुख से सुनी है। 2 1/2॥
 
Sinless son! In ancient times, Lord Mahavarah, who created the Pindas and maintained the tradition of Pinda Daan, and whatever method he conceived regarding the trend and retirement, I have heard all this from your mouth. 2 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)